Saturday, May 28, 2011

आओ ढूँढें 85 पैसा

भारत माता की जय बोलने का अधिकार उन्हें कदापि नही है...
जो भारत माता के श्रृंगार का धन चुराते हैं...
...देवी प्रसाद गुप्ता

विकास के बजट के रुपये का केवल १५ पैसे ही गाँव तक जाता है...
...राजीव गाँधी प्रधानमंत्री, १९८६

विकास के नाम पर खर्च होने वाला रुपया गाँव तक १० से १५ पैसे ही पहुच पाता है....
...अटल बिहाई बाजपेयी, २०११

गाँव के लाभार्थी का पैसा लाभार्थी तक जाते - जाते १५ पैसे ही रह जाता है...
...राहुल गाँधी, २००७

अब समय आ गया है मनमोहन सिंह जी देश की यह जनता यह जानना चाहती है... ८५ पैसा कहाँ जा रहा है...
 

"८५ पैसा ढूंढो आन्दोलन"
  
आइये मिलकर साथ चलें, आन्दोलन को तेज़ करें...
जब देश के प्रधानमंत्री यह स्वीकार करें... कि विकास के नाम पर खर्च होने वाला १ रुपया नीचे तक मात्र ८५ पैसा पहुँचता है...
तो फिर कैसे समृद्ध बनेगा भारत ?
कैसे होगा भारत निर्माण ?
गाँव उजड़ रहे हैं...
१५ पैसे में गाँव कब तक जिंदा रहेंगे ?

3 comments:

  1. Aage badho aur maango 85 paise ka hisab

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  2. bahut door ki soch hai, har bhartiy ko is aandolan me bhaagidaari karni chahiye........aisa mera maaannna hai............

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  3. काला धन उस व्यस्था की कोख से पैदा होता है जिसे राजीव तथा अटल ने खुलेआम बताया था कि विकास का एक रुपया नीचे केवल पन्द्रह पैसा ही पहुँचता है हमने पूछा ही नही पचासी पैसा कहाँ जाता है ? काला धन वापस आये उससे पहले जरुरी है कि उसकी कोख पर चोट हो अन्यथा वह फिर काला हो जायेगा !

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